सच्चे संत की पहचान

क्यों हमें किसी गुरु या संत की आवश्यकता है जबकि हम खुद अपना गुरु बन सकते हैं? क्या सही में हमें उस दलदल में पड़ने की जरूरत है कि ये संत है कि ढोंगी। की इनके पास जाइए, आपका बच्चा होगा। की इनके शिष्य बनिए आपका कल्याण होगा। क्या यही हमारी उद्देश्य है, किसके शिष्य बनना और उनका प्रचार करना? तो क्या फर्क रहगाया हममें और उन ईसाई प्रचारकों में जिन्हें हम अच्छे नजर से नहीं देखते। सही संत की पहचान करना बहुत मुश्किल है आजकल इन ढोंगियों के भीड़ में।

तो खुद के अंदर के संत को जागरूक कीजिए। आत्मज्ञान या ईश्वर को जानने केलिए आत्म चिंतन, मनन ही काफी है।

हमें कोई दूसरी संत या माध्यम की जरूरत ही नहीं होगी । अपनी चिंतन से आंख( अन्तर्दृष्टि) जब खुल जाएगा अपने आप ढोंगी बाबा आपको आकृष्ट नहीं करेंगे और आप सच्चे संत को देख कर ही पहचान लेंगे। इसमें और कोई कौशल या उपाय नहीं ।

नहीं समझ में आया?

तो चलिए यह कहानी सुनिए जो हम बचपन में चंदामामा या कहीं और पढ़े थे।

एक बार एक साधु बहुत दिन तपस्या करने के बाद स्वयं भगवान उनके सामने प्रकट हुए और बर मांगने पूछे। साधु जब तपस्या शुरू किए थे, तब उनके अंदर कोई प्रत्याशा नहीं थी। तो वो बोले “भगवान, हम तो कुछ सोचे ही नहीं। बस आपको प्रसन्न करने तपस्या में बैठ गए।”

भगवान साधु को बोले की छे महीने बाद वो फिर प्रकट होंगे तो तब साधु सोच कर मांग सकते हैं। इस बीच में साधु के शिष्य लॉग आपस में बात करने लगे कि उनके गुरुजी कितने महान है जो बरदान मिलने पर भी कुछ नहीं मांगे। यह सुनकर साधु महाराज भी खुदको दुनिया में सर्वश्रेष्ठ संयमी मानने लगे। छे महीने बाद जब भगवान प्रकट हुए तो उन्होंने उसने इस बात का ज़िक्र किया। भगवान मुस्कुराए और बोले, आप जाकर कोशल में रहने वाले “ रामदास” जी से मिलिए।

फिर साधु निकल पड़े रामदास जी से मिलने। वहां पहुंच कर देखे उनके पत्नी बाहर कपड़ा सी रहे थे। साधु पीछे रामदास जी कहां है। उनके पत्नी बोले “वो बाहर गए है।आप इंतज़ार कीजिए वो आजाएंगे।”

साधु को पहले से ही वो गृहस्थ होने पर उनके संयमी होनेपर शक हुआ था। अभी उनके पत्नी का साधुजी के प्रति आनुगत्य न दिखाना भी उन्हें अपमान दिया। फिर भी वो इंतज़ार किए। दोपहर में एक कृषक हल लेकर खेत से आए। वहीं रामदास थे। उन्होंने साधु जी को आदर सत्कार किया और भोजन पर बुलाया। तब तक मन ही मन साधु विचलित थे कि यह सांसारिक इनसान जो कि इतनी साधारण है वो कैसे भगवान के नजर में दुनिया में सबसे संयमी होस्कता है।

खाने पर बैठे तो खाना ठंडा था। साधु जी बोले रामदास खाना तो गरम नहीं है। रामदास जी बोले आप चिंता न करें में पंखा करता हूं। फिर वे पंखा किए और खाना अपने आप गरम होगया। आश्चर्य में डूबे हुए साधु चुपचाप खाना खाए और हात धोने कुएं के पास गए तो देखे रस्सी के साथ पात्र भी लटका हुआ है कुएं के मुंह पर। नीचे गिर नहीं रहा है। साधु अब खुदको और नहीं रोक पाए और रामदास जी से इन सब का ज़िक्र किए।

रामदास जी हस्कर बोले “ साधु जी हमे दश साल पहले सिद्धि प्राप्त हुई। लेकिन हम अपना दायित्व नहीं भूले। तो अपना कर्तव्य करते है, कर्म करते हैं ईश्वर मान कर। फिर जितना वक्त मिले चिंतन करते हैं। यही हमारी तपस्या है।”

साधु जी को समझ आ गया कि संसार से दूर रहकर संयम कर लेना कोई बड़ी बात नहीं। संसार पर अपना दायित्व निभा कर, तथा उसके साथ में आपना संयम बना रख, खुदके चित शुद्ध रखने को संयम कहा जाता है।

साधु महाराज वहीं पर अपना अहं त्याग दिए और रामदास जी के शिष्य बन गए।


शायद अभी ऊपर कहीं हुई बात साफ समझ में आया होगा।

तो आपने आप को प्रेरणा दीजिए और खुद का रास्ता खुद चुनें। माध्यम क्यों चाहिए?

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